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Showing posts from January 21, 2017

भगवान बुद्ध

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एक बार भगवान बुद्ध सभा में मौजूद लोगों को प्रवचन कर रहे थे। सभी लोग मंत्रमुग्ध होकर उनके उपदेशों का श्रवण कर रहे थे। भगवान बुद्ध से पूछा गया कि प्रभु सबसे सुखी कौन है। इस पर भगवान बुद्ध ने सभा में मौजूद लोगों की तरफ देखा और उनसे पूछा कि आप सभी में सबसे ज्यादा सुखी कौन है।  यह सुनकर सभी भक्त हैरत में पड़ गए। सभा में मौजूद भीड़ को देखने के बाद  भगवान बुद्ध ने सबसे पीछे एक फटेहाल व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए कहा कि वह है सबसे ज्यादा सुखी व्यक्ति। यह सुनकर सभी आश्चर्यचकित रह गए। लोगों की जिज्ञासा देखकर भगवान बुद्ध ने कहा कि मैं इसका प्रमाण देता हूं।   एक-एक कर भगवान बुद्ध सभी के पास गए और पूछा कि तुम्हें क्या चाहिए। हर एक ने अपनी जरूरत के बारे में बताया। सबसे अंत में भगवान बुद्ध उस फटेहाल व्यक्ति के पास पहुंचे और पूछा कि तुम्हें क्या चाहिए। यह सुनकर वह व्यक्ति बोला, प्रभु मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे तो बस आप आशीर्वाद दें और जो भी मेरे पास है, उसी में मैं संतोषपूर्वक जीवन जी सकूं। यह सुनकर सभा में मौजूद सभी लोगों को उत्तर मिल चुका था।

सात दिन

एक बार की बात है संत तुकाराम अपने आश्रम में बैठे हुए थे। इसी दौरान उनका एक शिष्य, जो स्वाभाव से थोड़ा क्रोधी था उनके समक्ष आया। शिष्य बोला, गुरुजी आप कैसे अपना व्यवहार इतना मधुर बनाए रहते हैं। न तो आप किसी पर क्रोध करते हो न ही किसी को भला-बुरा कहते हैं? कृपया अपने इस अच्छे व्यवहार का रहस्य बताइए।  संत बोले: मुझे अपने रहस्य के बारे में तो नहीं पता लेकिन मैं तुम्हारे रहस्य के बारे में अवश्य जानता हूं। शिष्य विस्मय से भर गया और बोला, वह क्या है गुरु जी? शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।”तुम अगले एक हफ्ते में मरने वाले हो!” संत तुकाराम दुखी होते हुए बोले। कोई और कहता तो शिष्य को ये बात मजाक लगती लेकिन स्वयं संत तुकाराम के मुख से निकली बात को कोई कैसे काट सकता था? शिष्य उदास हो गया और गुरु का आशीर्वाद लेकर वहां से चला गया। उस समय से शिष्य का स्वभाव बिलकुल बदल सा गया। वह हर किसी से प्रेम से मिलता और अपने स्वभाव से उलट किसी पर क्रोध भी न करता। वह अपना ज्यादातर समय ध्यान और पूजा में बिताने लगा। वह उनके पास भी जाने लगा और प्रेमपूर्वक मिलने लगा, जिनसे उसने कभी अभद्रता की थी या गलत व्यवहार किया था। वह …

शिक्षा अधूरी है।

काशी में गंगा के किनारे एक संत का आश्रम था, उसमें कई शिष्य अध्ययन करते थे। आखिर वह दिन आया जब शिक्षा पूरी होने के बाद गुरुदेव उन्हें अपना आशीर्वाद देकर विदा करने वाले थे। सुबह गंगा में स्नान करने के बाद गुरुदेव और सभी शिष्य पूजा करने बैठ गए। सभी ध्यानमग्न थे कि एक बच्चे की 'बचाओ बचाओ' की आवाज सुनाई पड़ी। एक बच्चा नदी में डूब रहा था।  आवाज सुनकर गुरुदेव की आंखें खुल गईं। उन्होंने देखा कि एक शिष्य पूजा छोड़कर बच्चे को बचाने के लिए नदी में कूद गया। वह किसी तरह बच्चे को बचाकर किनारे ले आया, लेकिन दूसरे शिष्य आंखें बंद किए ध्यानमग्न थे। पूजा खत्म होने के बाद गुरुदेव ने उन शिष्यों से पूछा,'क्या तुम लोगों को डूबते हुए बच्चे की आवाज सुनाई पड़ी थी?' शिष्यों ने कहा,'हां गुरुदेव, सुनी तो थी।' गुरुदेव ने कहा,'तब तुम्हारे मन में क्या विचार उठा था?' शिष्यों ने कहा, 'हम लोग ध्यान में डूबे थे। दूसरी तरफ ध्यान देने की बात मन में उठी ही नहीं।'  गुरुदेव ने कहा,'लेकिन तुम्हारा एक मित्र बच्चे को बचाने के लिए पूजा छोड़कर नदी में कूद पड़ा।' शिष्यों ने कहा,…