Friday, January 6, 2017

दो शब्दों की बात

एक मॉनेस्ट्री थी। वहां सभी को काफी सख्त अनुशासन में रहना होता था। सब पूरी तरह मौन रहते थे। किसी को भी बोलने की आज्ञा नहीं थी। बस इस नियम का केवल एक अपवाद था। हर दस साल बाद बौद्ध भिक्षु गुरु के सामने बोल सकते थे, वे भी केवल दो शब्द। एक बौद्ध भिक्षु को वहां रहते हुए दस साल हो गए थे। वह गुरु के पास गया। गुरु ने कहा, ‘तुम्हें यहां दस साल हो गए हैं। बताओ कौन से दो शब्द हैं, जो तुम बोलना चाहते  हो? ’
शिष्य ने कहा, ‘बिस्तर...सख्त।’
गुरु ने कहा, ‘देखता हूं।’
एक बार फिर दस साल बीतने के बाद  शिष्य गुरु के समक्ष उपस्थित हुआ। गुरु ने उसी तरह दो शब्द बोलने को कहा।
शिष्य ने कहा, ‘भोजन...बासी।’
गुरु ने फिर वही कहा, ‘देखता हूं।’
अगले दस साल फिर बीत गए। शिष्य फिर गुरु के पास गया। गुरु ने फिर कहा, ‘बताओ कौन से दो शब्द बोलना चाहते  हो?’
शिष्य ने कहा, ‘मैं...हारा!’
गुरु ने कहा, ‘अच्छा, जानते हो तुम क्यों हार गए?  क्यों छोड़ रहे हो? साल दर साल बीतते चले गए, पर तुम हमेशा शिकायती ही रहे। अपने लिए केवल समस्याएं ही खोज सके और कुछ नहीं।’

समय का महत्व

तलवारबाजी में कुशल एक योद्धा था। एक बार उसने अपने नौकर को अपनी पत्नी के साथ देख लिया। वहां की परंपरा के अनुसार, उसने नौकर को तलवार दी और युद्ध की चुनौती दी, ‘आज या तो तुम या मैं।’
नौकर को तो तलवार पकड़नी भी नहीं आती थी।  वह बोला, ‘स्वामी मैं आपका सम्मान करता हूं कि आप मुझ जैसे नौकर को ये अवसर दे रहे हैं। पर मैं तलवार चलाना नहीं जानता। मुझे कुछ समय दीजिए, ताकि मैं किसी के पास जाकर कुछ सीख सकूं।  योद्धा ने कहा, ‘ठीक है। जितना भी समय लो। मैं प्रतीक्षा करूंगा।’
वह एक अन्य योद्धा के पास गया। उसने कहा, ‘तुम वर्षों तक अभ्यास करोगो तो भी कुछ नहीं होगा। तुम्हारा स्वामी सर्वश्रेष्ठ तलवारबाज है। मेरी सलाह है कि यही लड़ाई का सही समय है। नौकर बोला, ‘मैं आपके पास सलाह के लिए आया हूं और आप कह रहे हैं, जा मर जा। 
योद्धा ने कहा, ‘हां, क्योंकि एक चीज निश्चित है-तुम्हारी मृत्यु। इसके अलावा तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है। पर तुम्हारे स्वामी की कई चीजें दांव पर हैं- पत्नी, पद, प्रतिष्ठा और वह एक बड़ा जमींदार भी है। वह अपनी पूर्णता में नहीं होगा, पर तुम हो सकते हो। तुम्हें होना ही होगा-जिस एक क्षण के लिए भी तुम्हारा ध्यान भटकेगा, वही आखिरी क्षण होगा। किसी और नियम-अनुशासन के बारे में फिलहाल मत सोचो। तलवार लो और युद्ध करो। नौकर लौट गया। 
मालिक ने कहा, ‘इतनी जल्दी सब सीख लिया?’ नौकर जोर से बोला, ‘कुछ सीखना नहीं है। मैं युद्ध के लिए तैयार हूं।’ 
योद्धा को विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसा क्या जादू हो गया है। वह घर से बाहर आया तो नौकर ने नियमों के अनुसार सिर झुकाया। उसके बाद नौकर ने तलवार चलानी शुरू कर दी। 
मालिक हक्का-बक्का था। एक एक्सपर्ट की नजर में कोई व्यक्ति जहां तलवार चलाता है, नौकर वहां नहीं चला रहा था। और वह जहां तलवार चलाता था, वहां कोई एक्सपर्ट सोच नहीं सकता था। जल्द ही योद्धा के कदम पीछे होने लगे। नौकर में थोड़ा और साहस आ गया। नौकर बस तलवार चला रहा था, बिना यह जाने कि क्यों, क्या उद्देश्य है और वह कैसी तलवार चला रहा है। वह अपनी मौत के भय से भी बाहर आ चुका था। जल्द ही उसने मालिक को किनारे कर दिया। 
अब मालिक को मृत्यु का डर सताने लगा। वह बोला, ‘रुको, मैं तुम्हें अपना सब कुछ देता हूं। मैं अब संन्यास के रास्ते जा रहा हूं। वह डर के मारे कांप रहा था। वह समझ नहीं पा रहा था कि आखिर नौकर में यह साहस कहां से आया? उसमें यह चित्त की एकाग्रता कैसे आयी?  
लेकिन सच यही है कि ऐसी किसी भी खास स्थिति में किसी भी नियम-कायदे से अधिक उस स्थिति में होना, पूरी तरह वर्तमान को जीना, बहुत कुछ जाग्रत कर देने वाला होता है। 

गति का नियम

न्यूटन से सैकड़ों साल पहले प्रसिद्ध भारतीय दार्शनिक आचार्य कणाद ने अपने वैशेषिक सूत्र में गति के नियमों को स्थापित कर दिया था। यह दावा है नेचुरल साइंसेज ट्रस्ट के चेयरमैन और शोभित विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर प्रियांक भारती का। 
उनके शोधपत्र, आचार्य कणाद : फादर ऑफ फिजिक्स एंड ट्रू इनवेंटर ऑफ लॉ ऑफ मोशंस के प्रकाशन के बाद विज्ञान जगत में इसे लेकर हलचल है। यह शोधपत्र इंटरनेशनल जनरल ऑफ साइंस एंड इंजीनियरिंग के अक्तूबर के अंक में प्रकाशित हुआ है। इस जर्नल का इपैक्ट फैक्टर तीन है। असिस्टेंट प्रोफेसर प्रियांक भारती ने शोधपत्र के माध्यम से बताया है कि न्यूटन ने 1686 में गति का नियम प्रतिपादित किया था।
न्यूटन ने अपने शोधपत्र प्रिंसिपिया ऑफ मैथमैटिका में गति के तीन नियम खोले थे, जिसमें गुरुत्वाकर्षण शक्ति, गतिज ऊर्जा और मोमेंटम के बारे में सिद्धांत दिए गए थे, जबकि भारतीय दर्शनशास्त्र के वैशेषिक सूत्र के अनुसार आचार्य कणाद ने 600 बीसी में ही गति के नियमों को स्थापित कर दिया था। यानी न्यूटन से करीब 2500 साल पहले। ऐसे में स्पष्ट है कि गति के सिद्धांत के जनक न्यूटन नहीं बल्कि कणाद थे।
वैशेषिक सूत्र में दसवें चैप्टर में 373 श्लोक हैं, जिसमें से निम्नलिखित श्लोक गति के नियम को समझाते हैं। उदाहरण के तौर पर गति के पहले नियम को वैशेषिक सूत्र के पहले चैप्टर के पहले भाग में 20वें श्लोक में
संयोगविभगावेगानं कर्म समानम, न द्रव्यानां कर्म, द्रव्यश्रय्यगुणावां संयोगविभागेस्वकारणमनपेक्ष इति गुणलक्षणम।
दूसरा गति के नियम में
नोदनविससभावांनोर्ध्वं न त्थ्र्यिगगमनं, प्रयत्नविशेषातनोदनविशेष :  नोदन विशेषात उदासन विशेष 
इस आधार पर किया दावा
तीसरा नियम कार्यविरोधि कर्म दिया है। इन सभी श्लोकों का अर्थ हूबहू वही है जो न्यूटन का सिद्धांत कहता है। उदाहरण के तौर पर आचार्य कणाद और न्यूटन के सिद्धांत की समानता इस प्रकार समझी जा सकती है।
न्यूटन का गति का तीसरा सिद्धांत :  प्रत्येक क्रिया की सदैव बराबर एवं विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है।
कणाद का गति का तीसरा सिद्धांत : कार्य विरोधि कर्म यानी कार्य (एक्शन), विरोधी (अपोजिट), एक्शन (यहां इसका आशय रिएक्शन है)

कौन थे आचार्य कणाद 
आचार्य कणाद का असल नाम कश्यप था। वह गुजरात के द्वारका के रहने वाले थे। वह दर्शन शास्त्र के बहुत बड़े ज्ञानी थे। उन्होंने वैशेषिका हिंदू दर्शन विद्यालय की स्थापना की थी। यह केंद्र दर्शन और गणित का बड़ा केंद्र था। उन्होंने अपने शोध वैशेषिक दर्शन में गति के नियमों को प्रतिपादित किया था। 

पुण्य की जड़ हरी

एक बड़ा व्यापारी नदी में स्नान करने गया। उस दिन वहां काफी भीड़ थी। व्यापारी की नजर नदी में डूबते हुए एक व्यक्ति पर पड़ी। वह तुरंत नदी में कूद गया। व्यक्ति को बाहर निकालने पर देखा कि वह उनका अकाउंटेंट था। कुछ देर बाद अकाउंटेंट को होश आया। व्यापारी ने उससे इस हालत में पहुंचने का कारण पूछा। अकाउंटेंट ने बात बनाते हुए कहा, ‘मैंने अपना सारा पैसा सट्टा बाजार में खो दिया है। लोगों का काफी उधार है मुझ पर। उन्हीं लोगों के डर से मैंने यह कदम उठाया है।’
व्यापारी ने अकाउंटेंट को सांत्वना दी व कहा, ‘अब चिंता छोड़ो, भविष्य में कभी ऐसा काम मत करना। ईमानदारी से नौकरी करते रहो।’
अकाउंटेंट को नौकरी करते हुए एक साल बीत गया। इस बीच व्यापारी को काफी लाभ हुआ। अकाउंटेंट की नीयत फिर खराब हो गयी। एक दिन उसके बेटे का जन्मदिन था। उसने सबको खीर खिलाई। व्यापारी के लिए भी एक कटोरा खीर लेकर वह उनके घर पहुंचा।  व्यापारी व्यस्त था तो उसे कटोरा मेज पर रखने को कह दिया। काम करते हुए देर हो गयी। थोड़ी देर बाद देखा तो खीर का कटोरा बिल्ली खा रही थी, जिसे खाते ही उसकी तबीयत बिगड़ गयी। व्यापारी को समझ आ गया, पर उसने किसी के सामने जिक्र नहीं किया। सोचा कि जब तक मेरा पुण्य है, मेरा कुछ नहीं हो सकता। अगले दिन अकाउंटेंट ने जब व्यापारी को देखा तो सकपका गया। व्यापारी ने फिर भी कुछ जाहिर नहीं किया।
अकाउंटेंट को लगा कि व्यापारी को कुछ पता नहीं चला। वह फिर व्यापारी का धन हड़पने के बारे में सोचने लगा। एक दिन व्यापारी को कहीं जाना था। उसने अकाउंटेंट को भी मोटी रकम साथ लेकर चलने को कहा। अकाउंटेंट ने व्यापारी को नुकसान पहुंचाने के लिए कुछ गुंडों को साथ रख लिया। एक मंदिर आया। व्यापारी उस ओर जाने लगा। वह जैसे ही झुका, गुंडों ने हमला कर दिया। व्यापारी वहीं बेहोश होकर गिर गया। अकाउंटेंट जैसे ही धन लेकर भागने लगा तो गुंडों की नीयत बिगड़ गयी। उन्होंने धन छीनकर उसे नदी में धकेल दिया। व्यापारी को होश आया तो सामने अकाउंटेंट को डूबते हुए देखा। अपने दयालु स्वभाव के अनुसार सेठ ने फिर अकाउंटेंट को बचा लिया। होश में आने के बाद अकाउंटेंट ने व्यापारी के पैर पकड़े और माफी मांगने लगा। व्यापारी ने उसे मन ही मन माफी दी और इतना ही कहा- जब तक किसी के पुण्य की जड़ें हरी हैं, तब तक कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

निर्माण : अन्न और चरित्र

महात्मा गांधी एक बार छोटे से गांव में पहुंचे तो वहां उनसे मिलने के लिए ग्रामीणों की भीड़ लग गई। गांधीजी ने उनसे पूछा कि इन दिनों आप कौन सा अन्न बो रहे हैं और किस अन्न की कटाई कर रहे हैं। भीड़ में से एक वृद्ध आगे आया और बोला, ज्येष्ठ का माह चल रहा है। इस माह खेतों में कोई फसल नहीं होती। इन दिनों हम लोग खाली रहते हैं। तब गांधीजी ने पूछा कि जब फसल बोने और काटने का समय होता है, तब आप लोगों के पास जरा सा भी समय नहीं होता होगा। वृद्ध ने कहा कि हां उस वक्त तो रोटी खाने का भी समय नहीं होता। इस पर गांधीजी ने कहा कि यदि तुम लोग चाहो तो इस समय भी कुछ बो और काट सकते हो।
यह सुनकर हैरान ग्रामीणों ने पूछा कि बताइये हमें क्या बोना और क्या काटना चाहिए। इस पर महात्मा गांधी ने कहा कि आप कर्म बोइए और आदत को काटिए। आदत को बोइए और चरित्र को काटिए। चरित्र को बोइए और भाग्य को काटिए, तभी तुम्हारा जीवन सार्थक हो पाएगा।
विचारों से होता है चरित्र का निर्माण : स्वामी विवेकानंद एक बार स्वामी विवेकानंद के विदेशी मित्र ने उनसे गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस से मिलवाने का आग्रह किया। जब स्वामी विवेकानंद ने उस मित्र को गुरु से मिलवाया तो वह स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पहनावे को देखकर आश्चर्यचकित हो गया। उसने कहा कि यह व्यक्ति आपका गुरु कैसे हो सकता है। इनको तो कपड़े पहनने का भी ढंग नहीं है। यह सुनकर स्वामी विवेकानंद ने बड़ी विनम्रता से कहा, मित्र आपके देश में चरित्र का निर्माण दर्जी करता है, लेकिन हमारे देश में चरित्र का निर्माण आचार-विचार करते हैं।

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