संत स्वामी रामकृष्ण परमहंस

कहा जाता है कि संत स्वामी रामकृष्ण परमहंस को काली माता के दर्शन ब्रह्मांड की माता के रूप में हुए थे। उनके माता पिता को उनके जन्म से पहले ही आलौकिक घटनाओं का अनुभव हुआ था। संन्यास ग्रहण करने के बाद उनका नाम श्रीरामकृष्ण परमहंस हुआ। स्वामी विवेकानंद उनके परम शिष्य थे।  
संत रामकृष्ण परमहंस को आध्यात्म पर चर्चा करना बहुत पसंद था। एक बार वह नागागुरु तोतापुरी के साथ बैठे थे। धूनी जल रही थी और ज्ञान पर चर्चा हो रही थी। तभी एक माली वहां से गुजरा और उसने धूनी से अपनी चिलम में भरने के लिए कुछ कोयले ले लिए। तोतापुरी जी को माली का इस तरह पवित्र धूनी छूना बुरा लगा। उन्होंने उसे अपशब्द कह दिए।
माली हमेशा स्वामी जी की धूनी से कोयले लेकर चिलम भरा करता था। इस घटना पर स्वामी जी जोर-जोर से हंसने लगे। नागा गुरु ने कहा कि माली ने पवित्र अग्नि को छूकर अपवित्र कर दिया। इस पर परमहंस ने कहा कि मुझे नहीं पता था कि किसी के छूने भर से कोई वस्तु अपवित्र हो जाती है। यह सुनकर नागा गुरु ने माली से क्षमा मांगी।
रामकृष्ण परमहंस को दक्षिणेश्वर में पुजारी की नौकरी मिली। 15 दिन बाद ही मंदिर कमेटी के सामने उनकी पेशी हो गई। उनके विरुद्ध शिकायतें पहुंची थीं। किसी ने कहा कि वह खुद चखकर भगवान को भोग लगाते हैं। फूलों को सूंघकर भगवान के चरणों में अर्पित करते हैं। 
इस पर कमेटी के सदस्यों के समक्ष स्वामी रामकृष्ण परमहंस ने सहज भाव से कहा कि मैं बिना सूंघे भगवान पर फूल क्यों चढ़ाऊं? पहले देख लेता हूं कि उस फूल से सुगंध आ रही है या नहीं? चखकर भोग लगाने की शिकायत पर उन्होंने कहा कि मुझे अपनी मां की याद है कि वह भी ऐसा ही करती थीं। जब कोई चीज बनाती थीं तो चखकर देख लेती थीं और तब मुझे खाने को देती थीं। मैं भी चखकर देखता हूं कि किसी भक्त ने भोग के लिए जो चीज लाई है वह भगवान को देने योग्य है या नहीं। यह सुनकर कमेटी के सदस्य निरुत्तर हो गए।

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