दो शब्दों की बात

एक मॉनेस्ट्री थी। वहां सभी को काफी सख्त अनुशासन में रहना होता था। सब पूरी तरह मौन रहते थे। किसी को भी बोलने की आज्ञा नहीं थी। बस इस नियम का केवल एक अपवाद था। हर दस साल बाद बौद्ध भिक्षु गुरु के सामने बोल सकते थे, वे भी केवल दो शब्द। एक बौद्ध भिक्षु को वहां रहते हुए दस साल हो गए थे। वह गुरु के पास गया। गुरु ने कहा, ‘तुम्हें यहां दस साल हो गए हैं। बताओ कौन से दो शब्द हैं, जो तुम बोलना चाहते  हो? ’
शिष्य ने कहा, ‘बिस्तर...सख्त।’
गुरु ने कहा, ‘देखता हूं।’
एक बार फिर दस साल बीतने के बाद  शिष्य गुरु के समक्ष उपस्थित हुआ। गुरु ने उसी तरह दो शब्द बोलने को कहा।
शिष्य ने कहा, ‘भोजन...बासी।’
गुरु ने फिर वही कहा, ‘देखता हूं।’
अगले दस साल फिर बीत गए। शिष्य फिर गुरु के पास गया। गुरु ने फिर कहा, ‘बताओ कौन से दो शब्द बोलना चाहते  हो?’
शिष्य ने कहा, ‘मैं...हारा!’
गुरु ने कहा, ‘अच्छा, जानते हो तुम क्यों हार गए?  क्यों छोड़ रहे हो? साल दर साल बीतते चले गए, पर तुम हमेशा शिकायती ही रहे। अपने लिए केवल समस्याएं ही खोज सके और कुछ नहीं।’

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