Tuesday, January 31, 2017

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा

सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिस्ताँ हमारा ग़ुरबत में हों अगर हम, रहता है दिल वतन में समझो वहीं हमें भी, दिल हो जहाँ हमारा परबत वो सबसे ऊँचा, हमसाया आसमाँ का वो संतरी हमारा, वो पासबाँ हमारा गोदी में खेलती हैं, जिसकी हज़ारों नदियाँ गुलशन है जिसके दम से, रश्क-ए-जिनाँ हमारा ऐ आब-ए-रूद-ए-गंगा! वो दिन है याद तुझको उतरा तेरे किनारे, जब कारवाँ हमारा मज़हब नहीं सिखाता, आपस में बैर रखना हिन्दी हैं हम, वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा यूनान-ओ-मिस्र-ओ- रोमा, सब मिट गए जहाँ से अब तक मगर है बाकी, नाम-ओ-निशाँ हमारा कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी सदियों रहा है दुश्मन, दौर-ए-जहाँ हमारा 'इक़बाल' कोई महरम, अपना नहीं जहाँ में मालूम क्या किसी को, दर्द-ए-निहाँ हमारा सारे जहाँ से अच्छा, हिन्दोस्ताँ हमारा हम बुलबुलें हैं इसकी, यह गुलिसताँ हमारा

Friday, January 27, 2017

गणतंत्र दिवस या २६ जनवरी।

आज पूरा भारत 67वां रिपब्लिक डे मना रहा है। राजपथ पर आज के दिन भारत के राष्ट्रपति तिरंगा फहराते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं यह 26 जनवरी को ही क्यों मनाया जाता है? पहली बार राष्ट्रीय ध्वज कहां फहराया था? तो आइए हम आपको बताते हैं कि रिपब्लिक डे के बारे में कुछ ऐसे फैक्ट्स जो शायद ही आप जानते होंगे। हमारे नेता डोमिनन स्टेटस के पक्ष में थे। जहां पर यूके का मोनार्च ही भारतीय संविधान का अध्यक्ष होगा। साल 1927 के दरमियान भगत सिंह और हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोशियशन की भारतीय राजनीति में मांग बढ रही थी। कांग्रेस से अलग भगत सिंह और उनकी फौज ने भारत की पूरी आजादी की बात रखी। अब इससे इंडियन नेशनल कांग्रेस के जो युवा नेता थे सुभाष चंद्र बोस, जवाहर लाल नेहरु वे भी प्रभावित हो गए। उन्होंने कांग्रेस से मांग की वे भी पूरी आजादी की मांग करे, लेकिन उनकी ये आवाज सुनी नहीं गई। दिसंबर 1928 में आईएनसी ने डोमिनन स्टेटश की मांग करते हुए एक प्रस्ताव लाई, और ब्रिटिश सरकार को एक साल का समय दिया। ब्रिटिश ने इस विचार को नकार दिया, ये कहते हुए कि भारत डोमिनन स्टेटस के लिए अभी तैयार नहीं है। अब इससे कांग्रेस नाराज हो गई। लाहौर में 1929 में एक सेशन के दौरान नेहरू को अध्यक्ष चुन लिया गया। और कांग्रेस ने डोमिनन स्टेटस से अलग पूर्ण स्वराज के लिए वोट किया। इसके बाद एक प्रस्ताव पारित हुआ कि 1930 में जनवरी के आखिरी रविवार को स्वतंत्रा दिवस के रुप में मनाया जाए। जनवरी का आखिरी रविवार 1930 में 26 तारीख को पड़ा। इस दिन जवाहर लाल नेहरु ने लाहौर में रवि नदी के किनारे तिरंगा फहराया। इसके बाद भारत ने 26 जनवरी 1930 को स्वतंत्रा दिवस के रुप में मनाया लेकिन ब्रिटिश अभी भारत में ही थे। 15 अगस्त 1947 से पहले जब भारत को आजादी मिली, हमारी संविधान सभा जिसका गठन 1946 में हो गया था, और हमारा संविधान 26 नवंबर 1949 तक तैयार हो गया था। तब जो नेता थे उन्होने दो महीने और रुकने का निर्णय लिया। ऐसे में 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। इसके अलावा ये भी 26 जनवरी को हुआ -पहले गणतंत्र दिवस पर दिल्ली के इर्विन स्टेडियम में झंडा फहराया गया था। -पूर्ण स्वराज दिवस (26 जनवरी 1930) को ध्यान में रखते हुए भारतीय संविधान 26 जनवरी को लागू किया गया था। -आईएसटी के अनुसार 26 जनवरी 1950 को 10.18 मिनट पर भारत का संविधान लागू किया गया। -भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद ने गवर्नमैंट हाऊस में 26 जनवरी 1950 को शपथ ली थी। -गणतंत्र दिवस की पहली परेड 1955 को दिल्ली के राजपथ पर हुई थी। -राजपथ परेड के पहले मुख्य अतिथि पाकस्तिान के गवर्नर जनरल मलिक गुलाम मोहम्मद थे। -मोर को भारत का राष्ट्रीय पक्षी 26 जनवरी 1963 को घोषित किया गया था। -1950 से 1954 के बीच गणतंत्र दिवस का समारोह इर्विन स्टेडियम किंग्सवे, लाल किला तो कभी रामलीला मैदान में हुआ करता था। -26 जनवरी को ही सारनाथ के अशोक स्तंभ पर बने सिंह को राष्टरीय प्रतीक के रूप में अपनाया गया था। -रिपब्लिक डे परेड 1950 को पहले चीफ इंडोनेशिया के तत्कालीन राष्ट्रपति ''सुकर्णो'' थे।

Saturday, January 21, 2017

भगवान बुद्ध

एक बार भगवान बुद्ध सभा में मौजूद लोगों को प्रवचन कर रहे थे। सभी लोग मंत्रमुग्ध होकर उनके उपदेशों का श्रवण कर रहे थे। भगवान बुद्ध से पूछा गया कि प्रभु सबसे सुखी कौन है। इस पर भगवान बुद्ध ने सभा में मौजूद लोगों की तरफ देखा और उनसे पूछा कि आप सभी में सबसे ज्यादा सुखी कौन है। 
यह सुनकर सभी भक्त हैरत में पड़ गए। सभा में मौजूद भीड़ को देखने के बाद 
भगवान बुद्ध ने सबसे पीछे एक फटेहाल व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए कहा कि वह है सबसे ज्यादा सुखी व्यक्ति। यह सुनकर सभी आश्चर्यचकित रह गए। लोगों की जिज्ञासा देखकर भगवान बुद्ध ने कहा कि मैं इसका प्रमाण देता हूं।  
एक-एक कर भगवान बुद्ध सभी के पास गए और पूछा कि तुम्हें क्या चाहिए। हर एक ने अपनी जरूरत के बारे में बताया। सबसे अंत में भगवान बुद्ध उस फटेहाल व्यक्ति के पास पहुंचे और पूछा कि तुम्हें क्या चाहिए। यह सुनकर वह व्यक्ति बोला, प्रभु मुझे कुछ नहीं चाहिए। मुझे तो बस आप आशीर्वाद दें और जो भी मेरे पास है, उसी में मैं संतोषपूर्वक जीवन जी सकूं। यह सुनकर सभा में मौजूद सभी लोगों को उत्तर मिल चुका था।

सात दिन

एक बार की बात है संत तुकाराम अपने आश्रम में बैठे हुए थे। इसी दौरान उनका एक शिष्य, जो स्वाभाव से थोड़ा क्रोधी था उनके समक्ष आया। शिष्य बोला, गुरुजी आप कैसे अपना व्यवहार इतना मधुर बनाए रहते हैं। न तो आप किसी पर क्रोध करते हो न ही किसी को भला-बुरा कहते हैं? कृपया अपने इस अच्छे व्यवहार का रहस्य बताइए। 
संत बोले: मुझे अपने रहस्य के बारे में तो नहीं पता लेकिन मैं तुम्हारे रहस्य के बारे में अवश्य जानता हूं। शिष्य विस्मय से भर गया और बोला, वह क्या है गुरु जी? शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।”तुम अगले एक हफ्ते में मरने वाले हो!” संत तुकाराम दुखी होते हुए बोले। कोई और कहता तो शिष्य को ये बात मजाक लगती लेकिन स्वयं संत तुकाराम के मुख से निकली बात को कोई कैसे काट सकता था? शिष्य उदास हो गया और गुरु का आशीर्वाद लेकर वहां से चला गया।
उस समय से शिष्य का स्वभाव बिलकुल बदल सा गया। वह हर किसी से प्रेम से मिलता और अपने स्वभाव से उलट किसी पर क्रोध भी न करता। वह अपना ज्यादातर समय ध्यान और पूजा में बिताने लगा। वह उनके पास भी जाने लगा और प्रेमपूर्वक मिलने लगा, जिनसे उसने कभी अभद्रता की थी या गलत व्यवहार किया था। वह उनसे माफ़ी मांगता, हंसता-बोलता।  देखते-देखते संत की भविष्यवाणी को एक हफ्ता पूरा होने को आया।
इस पर शिष्य ने सोचा, चलो एक आखिरी बार गुरु जी के दर्शन कर आशीर्वाद ले लेना चाहिए। वह गुरु के समक्ष पहुंचा और बोला-गुरुजी, मेरा समय पूरा होने वाला है, कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिये!” “मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है पुत्र। इसके बाद गुरु जी बोले, ये बताओ कि पिछले सात दिन कैसे बीते? क्या तुम पहले की तरह ही लोगों से नाराज हुए, उन्हें अपशब्द कहे?”
शिष्य बोला, नहीं उसके पास जीन के लिए सिर्फ सात दिन थे तो वह सबसे प्रेम से मिला। इतना ही नहीं उसने जिन लोगों को दिल दुखाया था, उनसे क्षमा भी मांगी। संत तुकाराम मुस्कुराए और बोले, “बस यही तो मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है। मैं जानता हूँ कि मैं कभी भी मर सकता हूँ, इसलिए मैं हर किसी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करता हूँ, और यही मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य है। शिष्य समझ गया कि संत तुकाराम ने उसे जीवन का यह पाठ पढ़ाने के लिए ही मृत्यु का भय दिखाया था। 
शिक्षा : वास्तव में हमारे पास भी सात दिन ही बचें हैं :- रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि। आठवां दिन तो बना ही नहीं है। आइये आज से परिवर्तन आरम्भ करें। 

शिक्षा अधूरी है।

काशी में गंगा के किनारे एक संत का आश्रम था, उसमें कई शिष्य अध्ययन करते थे। आखिर वह दिन आया जब शिक्षा पूरी होने के बाद गुरुदेव उन्हें अपना आशीर्वाद देकर विदा करने वाले थे। सुबह गंगा में स्नान करने के बाद गुरुदेव और सभी शिष्य पूजा करने बैठ गए। सभी ध्यानमग्न थे कि एक बच्चे की 'बचाओ बचाओ' की आवाज सुनाई पड़ी। एक बच्चा नदी में डूब रहा था। 
आवाज सुनकर गुरुदेव की आंखें खुल गईं। उन्होंने देखा कि एक शिष्य पूजा छोड़कर बच्चे को बचाने के लिए नदी में कूद गया। वह किसी तरह बच्चे को बचाकर किनारे ले आया, लेकिन दूसरे शिष्य आंखें बंद किए ध्यानमग्न थे। पूजा खत्म होने के बाद गुरुदेव ने उन शिष्यों से पूछा,'क्या तुम लोगों को डूबते हुए बच्चे की आवाज सुनाई पड़ी थी?' शिष्यों ने कहा,'हां गुरुदेव, सुनी तो थी।' गुरुदेव ने कहा,'तब तुम्हारे मन में क्या विचार उठा था?' शिष्यों ने कहा, 'हम लोग ध्यान में डूबे थे। दूसरी तरफ ध्यान देने की बात मन में उठी ही नहीं।' 
गुरुदेव ने कहा,'लेकिन तुम्हारा एक मित्र बच्चे को बचाने के लिए पूजा छोड़कर नदी में कूद पड़ा।' शिष्यों ने कहा,'उसने पूजा छोड़कर अधर्म किया है।' इस पर गुरुदेव ने कहा,'अधर्म उसने नहीं, तुम लोगों ने किया है। तुमने डूबते हुए बच्चे की पुकार अनसुनी कर दी। पूजा-पाठ, धर्म-कर्म का एक ही उद्देश्य होता है प्राणियों की रक्षा करना। तुम आश्रम में धर्मशास्त्रों, व्याकरणों, धर्म-कर्म आदि में पारंगत तो हुए, लेकिन धर्म का सार नहीं समझ सके। 
परोपकार और संकट में फंसे दूसरे की सहायता करने से बड़ा कोई धर्म नहीं। पूजा पाठ का असल संदेश है कि हम दूसरे की मदद करें।' गुरुदेव ने उस शिष्य को अपना आशीर्वाद देकर आश्रम से विदा किया जिसने डूबते हुए बच्चे को बचाया था। शेष शिष्यों से कहा, 'अभी तुम्हारी शिक्षा अधूरी है।'

Friday, January 6, 2017

दो शब्दों की बात

एक मॉनेस्ट्री थी। वहां सभी को काफी सख्त अनुशासन में रहना होता था। सब पूरी तरह मौन रहते थे। किसी को भी बोलने की आज्ञा नहीं थी। बस इस नियम का केवल एक अपवाद था। हर दस साल बाद बौद्ध भिक्षु गुरु के सामने बोल सकते थे, वे भी केवल दो शब्द। एक बौद्ध भिक्षु को वहां रहते हुए दस साल हो गए थे। वह गुरु के पास गया। गुरु ने कहा, ‘तुम्हें यहां दस साल हो गए हैं। बताओ कौन से दो शब्द हैं, जो तुम बोलना चाहते  हो? ’
शिष्य ने कहा, ‘बिस्तर...सख्त।’
गुरु ने कहा, ‘देखता हूं।’
एक बार फिर दस साल बीतने के बाद  शिष्य गुरु के समक्ष उपस्थित हुआ। गुरु ने उसी तरह दो शब्द बोलने को कहा।
शिष्य ने कहा, ‘भोजन...बासी।’
गुरु ने फिर वही कहा, ‘देखता हूं।’
अगले दस साल फिर बीत गए। शिष्य फिर गुरु के पास गया। गुरु ने फिर कहा, ‘बताओ कौन से दो शब्द बोलना चाहते  हो?’
शिष्य ने कहा, ‘मैं...हारा!’
गुरु ने कहा, ‘अच्छा, जानते हो तुम क्यों हार गए?  क्यों छोड़ रहे हो? साल दर साल बीतते चले गए, पर तुम हमेशा शिकायती ही रहे। अपने लिए केवल समस्याएं ही खोज सके और कुछ नहीं।’

समय का महत्व

तलवारबाजी में कुशल एक योद्धा था। एक बार उसने अपने नौकर को अपनी पत्नी के साथ देख लिया। वहां की परंपरा के अनुसार, उसने नौकर को तलवार दी और युद्ध की चुनौती दी, ‘आज या तो तुम या मैं।’
नौकर को तो तलवार पकड़नी भी नहीं आती थी।  वह बोला, ‘स्वामी मैं आपका सम्मान करता हूं कि आप मुझ जैसे नौकर को ये अवसर दे रहे हैं। पर मैं तलवार चलाना नहीं जानता। मुझे कुछ समय दीजिए, ताकि मैं किसी के पास जाकर कुछ सीख सकूं।  योद्धा ने कहा, ‘ठीक है। जितना भी समय लो। मैं प्रतीक्षा करूंगा।’
वह एक अन्य योद्धा के पास गया। उसने कहा, ‘तुम वर्षों तक अभ्यास करोगो तो भी कुछ नहीं होगा। तुम्हारा स्वामी सर्वश्रेष्ठ तलवारबाज है। मेरी सलाह है कि यही लड़ाई का सही समय है। नौकर बोला, ‘मैं आपके पास सलाह के लिए आया हूं और आप कह रहे हैं, जा मर जा। 
योद्धा ने कहा, ‘हां, क्योंकि एक चीज निश्चित है-तुम्हारी मृत्यु। इसके अलावा तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है। पर तुम्हारे स्वामी की कई चीजें दांव पर हैं- पत्नी, पद, प्रतिष्ठा और वह एक बड़ा जमींदार भी है। वह अपनी पूर्णता में नहीं होगा, पर तुम हो सकते हो। तुम्हें होना ही होगा-जिस एक क्षण के लिए भी तुम्हारा ध्यान भटकेगा, वही आखिरी क्षण होगा। किसी और नियम-अनुशासन के बारे में फिलहाल मत सोचो। तलवार लो और युद्ध करो। नौकर लौट गया। 
मालिक ने कहा, ‘इतनी जल्दी सब सीख लिया?’ नौकर जोर से बोला, ‘कुछ सीखना नहीं है। मैं युद्ध के लिए तैयार हूं।’ 
योद्धा को विश्वास नहीं हो रहा था कि ऐसा क्या जादू हो गया है। वह घर से बाहर आया तो नौकर ने नियमों के अनुसार सिर झुकाया। उसके बाद नौकर ने तलवार चलानी शुरू कर दी। 
मालिक हक्का-बक्का था। एक एक्सपर्ट की नजर में कोई व्यक्ति जहां तलवार चलाता है, नौकर वहां नहीं चला रहा था। और वह जहां तलवार चलाता था, वहां कोई एक्सपर्ट सोच नहीं सकता था। जल्द ही योद्धा के कदम पीछे होने लगे। नौकर में थोड़ा और साहस आ गया। नौकर बस तलवार चला रहा था, बिना यह जाने कि क्यों, क्या उद्देश्य है और वह कैसी तलवार चला रहा है। वह अपनी मौत के भय से भी बाहर आ चुका था। जल्द ही उसने मालिक को किनारे कर दिया। 
अब मालिक को मृत्यु का डर सताने लगा। वह बोला, ‘रुको, मैं तुम्हें अपना सब कुछ देता हूं। मैं अब संन्यास के रास्ते जा रहा हूं। वह डर के मारे कांप रहा था। वह समझ नहीं पा रहा था कि आखिर नौकर में यह साहस कहां से आया? उसमें यह चित्त की एकाग्रता कैसे आयी?  
लेकिन सच यही है कि ऐसी किसी भी खास स्थिति में किसी भी नियम-कायदे से अधिक उस स्थिति में होना, पूरी तरह वर्तमान को जीना, बहुत कुछ जाग्रत कर देने वाला होता है। 

गति का नियम

न्यूटन से सैकड़ों साल पहले प्रसिद्ध भारतीय दार्शनिक आचार्य कणाद ने अपने वैशेषिक सूत्र में गति के नियमों को स्थापित कर दिया था। यह दावा है नेचुरल साइंसेज ट्रस्ट के चेयरमैन और शोभित विश्वविद्यालय के असिस्टेंट प्रोफेसर प्रियांक भारती का। 
उनके शोधपत्र, आचार्य कणाद : फादर ऑफ फिजिक्स एंड ट्रू इनवेंटर ऑफ लॉ ऑफ मोशंस के प्रकाशन के बाद विज्ञान जगत में इसे लेकर हलचल है। यह शोधपत्र इंटरनेशनल जनरल ऑफ साइंस एंड इंजीनियरिंग के अक्तूबर के अंक में प्रकाशित हुआ है। इस जर्नल का इपैक्ट फैक्टर तीन है। असिस्टेंट प्रोफेसर प्रियांक भारती ने शोधपत्र के माध्यम से बताया है कि न्यूटन ने 1686 में गति का नियम प्रतिपादित किया था।
न्यूटन ने अपने शोधपत्र प्रिंसिपिया ऑफ मैथमैटिका में गति के तीन नियम खोले थे, जिसमें गुरुत्वाकर्षण शक्ति, गतिज ऊर्जा और मोमेंटम के बारे में सिद्धांत दिए गए थे, जबकि भारतीय दर्शनशास्त्र के वैशेषिक सूत्र के अनुसार आचार्य कणाद ने 600 बीसी में ही गति के नियमों को स्थापित कर दिया था। यानी न्यूटन से करीब 2500 साल पहले। ऐसे में स्पष्ट है कि गति के सिद्धांत के जनक न्यूटन नहीं बल्कि कणाद थे।
वैशेषिक सूत्र में दसवें चैप्टर में 373 श्लोक हैं, जिसमें से निम्नलिखित श्लोक गति के नियम को समझाते हैं। उदाहरण के तौर पर गति के पहले नियम को वैशेषिक सूत्र के पहले चैप्टर के पहले भाग में 20वें श्लोक में
संयोगविभगावेगानं कर्म समानम, न द्रव्यानां कर्म, द्रव्यश्रय्यगुणावां संयोगविभागेस्वकारणमनपेक्ष इति गुणलक्षणम।
दूसरा गति के नियम में
नोदनविससभावांनोर्ध्वं न त्थ्र्यिगगमनं, प्रयत्नविशेषातनोदनविशेष :  नोदन विशेषात उदासन विशेष 
इस आधार पर किया दावा
तीसरा नियम कार्यविरोधि कर्म दिया है। इन सभी श्लोकों का अर्थ हूबहू वही है जो न्यूटन का सिद्धांत कहता है। उदाहरण के तौर पर आचार्य कणाद और न्यूटन के सिद्धांत की समानता इस प्रकार समझी जा सकती है।
न्यूटन का गति का तीसरा सिद्धांत :  प्रत्येक क्रिया की सदैव बराबर एवं विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया होती है।
कणाद का गति का तीसरा सिद्धांत : कार्य विरोधि कर्म यानी कार्य (एक्शन), विरोधी (अपोजिट), एक्शन (यहां इसका आशय रिएक्शन है)

कौन थे आचार्य कणाद 
आचार्य कणाद का असल नाम कश्यप था। वह गुजरात के द्वारका के रहने वाले थे। वह दर्शन शास्त्र के बहुत बड़े ज्ञानी थे। उन्होंने वैशेषिका हिंदू दर्शन विद्यालय की स्थापना की थी। यह केंद्र दर्शन और गणित का बड़ा केंद्र था। उन्होंने अपने शोध वैशेषिक दर्शन में गति के नियमों को प्रतिपादित किया था। 

पुण्य की जड़ हरी

एक बड़ा व्यापारी नदी में स्नान करने गया। उस दिन वहां काफी भीड़ थी। व्यापारी की नजर नदी में डूबते हुए एक व्यक्ति पर पड़ी। वह तुरंत नदी में कूद गया। व्यक्ति को बाहर निकालने पर देखा कि वह उनका अकाउंटेंट था। कुछ देर बाद अकाउंटेंट को होश आया। व्यापारी ने उससे इस हालत में पहुंचने का कारण पूछा। अकाउंटेंट ने बात बनाते हुए कहा, ‘मैंने अपना सारा पैसा सट्टा बाजार में खो दिया है। लोगों का काफी उधार है मुझ पर। उन्हीं लोगों के डर से मैंने यह कदम उठाया है।’
व्यापारी ने अकाउंटेंट को सांत्वना दी व कहा, ‘अब चिंता छोड़ो, भविष्य में कभी ऐसा काम मत करना। ईमानदारी से नौकरी करते रहो।’
अकाउंटेंट को नौकरी करते हुए एक साल बीत गया। इस बीच व्यापारी को काफी लाभ हुआ। अकाउंटेंट की नीयत फिर खराब हो गयी। एक दिन उसके बेटे का जन्मदिन था। उसने सबको खीर खिलाई। व्यापारी के लिए भी एक कटोरा खीर लेकर वह उनके घर पहुंचा।  व्यापारी व्यस्त था तो उसे कटोरा मेज पर रखने को कह दिया। काम करते हुए देर हो गयी। थोड़ी देर बाद देखा तो खीर का कटोरा बिल्ली खा रही थी, जिसे खाते ही उसकी तबीयत बिगड़ गयी। व्यापारी को समझ आ गया, पर उसने किसी के सामने जिक्र नहीं किया। सोचा कि जब तक मेरा पुण्य है, मेरा कुछ नहीं हो सकता। अगले दिन अकाउंटेंट ने जब व्यापारी को देखा तो सकपका गया। व्यापारी ने फिर भी कुछ जाहिर नहीं किया।
अकाउंटेंट को लगा कि व्यापारी को कुछ पता नहीं चला। वह फिर व्यापारी का धन हड़पने के बारे में सोचने लगा। एक दिन व्यापारी को कहीं जाना था। उसने अकाउंटेंट को भी मोटी रकम साथ लेकर चलने को कहा। अकाउंटेंट ने व्यापारी को नुकसान पहुंचाने के लिए कुछ गुंडों को साथ रख लिया। एक मंदिर आया। व्यापारी उस ओर जाने लगा। वह जैसे ही झुका, गुंडों ने हमला कर दिया। व्यापारी वहीं बेहोश होकर गिर गया। अकाउंटेंट जैसे ही धन लेकर भागने लगा तो गुंडों की नीयत बिगड़ गयी। उन्होंने धन छीनकर उसे नदी में धकेल दिया। व्यापारी को होश आया तो सामने अकाउंटेंट को डूबते हुए देखा। अपने दयालु स्वभाव के अनुसार सेठ ने फिर अकाउंटेंट को बचा लिया। होश में आने के बाद अकाउंटेंट ने व्यापारी के पैर पकड़े और माफी मांगने लगा। व्यापारी ने उसे मन ही मन माफी दी और इतना ही कहा- जब तक किसी के पुण्य की जड़ें हरी हैं, तब तक कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।

निर्माण : अन्न और चरित्र

महात्मा गांधी एक बार छोटे से गांव में पहुंचे तो वहां उनसे मिलने के लिए ग्रामीणों की भीड़ लग गई। गांधीजी ने उनसे पूछा कि इन दिनों आप कौन सा अन्न बो रहे हैं और किस अन्न की कटाई कर रहे हैं। भीड़ में से एक वृद्ध आगे आया और बोला, ज्येष्ठ का माह चल रहा है। इस माह खेतों में कोई फसल नहीं होती। इन दिनों हम लोग खाली रहते हैं। तब गांधीजी ने पूछा कि जब फसल बोने और काटने का समय होता है, तब आप लोगों के पास जरा सा भी समय नहीं होता होगा। वृद्ध ने कहा कि हां उस वक्त तो रोटी खाने का भी समय नहीं होता। इस पर गांधीजी ने कहा कि यदि तुम लोग चाहो तो इस समय भी कुछ बो और काट सकते हो।
यह सुनकर हैरान ग्रामीणों ने पूछा कि बताइये हमें क्या बोना और क्या काटना चाहिए। इस पर महात्मा गांधी ने कहा कि आप कर्म बोइए और आदत को काटिए। आदत को बोइए और चरित्र को काटिए। चरित्र को बोइए और भाग्य को काटिए, तभी तुम्हारा जीवन सार्थक हो पाएगा।
विचारों से होता है चरित्र का निर्माण : स्वामी विवेकानंद एक बार स्वामी विवेकानंद के विदेशी मित्र ने उनसे गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस से मिलवाने का आग्रह किया। जब स्वामी विवेकानंद ने उस मित्र को गुरु से मिलवाया तो वह स्वामी रामकृष्ण परमहंस के पहनावे को देखकर आश्चर्यचकित हो गया। उसने कहा कि यह व्यक्ति आपका गुरु कैसे हो सकता है। इनको तो कपड़े पहनने का भी ढंग नहीं है। यह सुनकर स्वामी विवेकानंद ने बड़ी विनम्रता से कहा, मित्र आपके देश में चरित्र का निर्माण दर्जी करता है, लेकिन हमारे देश में चरित्र का निर्माण आचार-विचार करते हैं।

Wednesday, January 4, 2017

बाहशाह सलामत और पादरी

सिंधु नदी के किनारे बादशाह सलामत का खेमा लगा था। रात का वक्त था और शाही लश्कर के बीचोबीच आकाश दीया चमक रहा था। बादशाह सलामत अपनी दोआशियाना मंजिल मे पादरी मोन्सेराते के साथ बैठे ये देख रहे थे कि नक्शे पर पुर्तगाल उनकी सल्तनत से कितना दूर है।
एकाएक बादशाह ने सर उठा कर पादरी मोन्सेराते से पूछा, "पादरी शादी क्यों नहीं करते ? क्या ये खुदा का हुक्म नहीं है कि सभी मर्दों की बीवियां होनी चाहिए ? ऐसा लगता है आप या तो शादी के खिलाफ है या अपनी ही बात को झूठलाते हैं....शादी नहीं करना भी अच्छा है और करना भी अच्छा है।"
पादरी ने जवाब दिया,"हजरत बादशाह नही जानते कि दो अच्छे बातों मे से एक अक्सर ज्यादा बेहतर होती है ? जैसे चांदी अच्छा है, लेकिन सोना और ज्यादा अच्छा। अक्ल सोने से बेहतर है और चरित्र सबसे बेहतर। चाँद खूबसूरत है, लेकिन सूरज और भी ज्यादा।" 
बाहशाह सलामत सहमत हुए तो पादरी  मोन्सेराते ने कहा, "पादरी शादी नही करते ताकि वो इससे बेहतर कर सकें। ईसा मसीह जैसा बनें। बिना किसी ख्वाहिश के ऊपर उठकर जिएं। छठे खुदाई हुक्म के मुताबिक ईसाईयों को बल्कि पूरी इंसानियत को ऐशो-आराम मना है।"
बाहशाह सलामत ने पूछा, "आप लोग ये कहते है ना कि ईसा खुदा हैं! तो ये उम्मीद करना गुस्ताखी नहीं है कि आप उन जैसे होना चाहते हैं ?"
पादरी ने जवाब, "हम ये मानते हैं कि ईसा खुदा हैं, लेकिन इसके साथ हम ये भी मानते हैं कि वो इंसान है। बतौर इंसान शादी नहीं कर के उन्होंने हमारे लिए एक मिसाल कायम की है। इंजील मुकद्धस में शादी नहीं करने को बहुत अच्छा माना गया है।जहाँ तक खुदा होने का सवाल है कोई गुरूर वाला ही होगा जो ईसा होना चाहेगा। ये तो नामुमकिन मंसूबा है। ऐसा मंसूबा रखना तो पागलपन है, लेकिन दूसरी तरफ भक्ति और इबादत जाहिर होती है। उन जैसे होने की कोशिश को ईसा बहुत पसंद करते हैं। इसे कतई गुस्ताखी नहीं माना जाता।"
......हाँ ये जरूर हो सकता है कि कुछ को मजबूरन शादी करनी पड़े।'  "जैसे कौन ?" बादशाह ने पूछा। "एक बादशाह, जिसे सल्तनत की सुख शांति के लिए वारिस चाहिए।
सिंधु नदी के किनारे फौज पचास दिनों तक रूकी। बादशाह सलामत ने पास के जंगल में शिकार कर के अपना वक्त गुजारा। इस दौरान पादरी मोन्सेराते से मुलाकातें होती रहीं, क्योंकि बादशाह के पास सवालों की लम्बी फेहरिस्त थीं।
न्यूज पेपर सें

यात्रा जिंदगी की

एक युवा लड़की अपने प्रेमी को बहुत प्यार करती थी। वह नौकरी के काम से किसी दूसरे शहर में रह रहा था ।काफी समय हो गया था, इसलिए उसे बहुत याद करती थी। एक बुजुर्ग थे, जिन्हें वह बहुत मानती थी। उनके पास अक्सर जाया करती थी। उनकी हर बात मानती थी। अबकी बार उसे उनसे मिले काफी समय हो गया था। आखिरकार एक दिन वह उनसे मिलने पहुँची। बुजुर्ग ने महिला का स्वागत किया और उसके हाथ में ताजे अंगूर टोकरी पकड़ायी और कहा, "क्या तुम उस पहाड़ को देख रही हो ?" महिला ने कहा, "हां।" बुजुर्ग ने कहा, "इस टोकरी को उस पर्वत के ऊपर लेकर जाओ ।"
 महिला कुछ नहीं पुछा। हालाँकि वो यह करने की इच्छुक नहीं थी। नाखुश मन से  उसने टोकरी लेकर पर्वत कि दिशा कि कदम बढ़ाने लगी। जैसे-जैसे चढ़ाई आ रही थी, चढ़ना मुश्किल हो रहा था।वह मन  ही मन बोल रही थी कि बुजुर्ग ने उसे किस काम पर लगा दिया है, उसे यह काम क्यों करना पड़ रहा है ? इस काम का क्या मतलब है? व्यर्थ ही यहाँ आई । सूरज का तेज धूप उसे झुलसा रही थी। अंगूर के गुच्छों का वजन अब असहनीय हो रहा था। कुछ भी उसे ऊपर चढ़ने मे प्रेरित नहीं कर रहा था। आखिरकार वह पर्वत के आखिरी हिस्से तक पहुँच ही गयी। उसने खुद को सुंदर और शांत फूलों की घाटी में खड़ा पाया। अंगूर अभी भी ताजा दिख रहे थे। वह घाटी के चारों तरफ देखने लगी, तभी उसने देखा की उसका प्रेमी उसकी ओर आ रहा है। वह मुस्कराते हुए उसका स्वागत कर रही थी। अंत में महिला ने कहा, "अगर मैं जानती कि ये अंगूर मेरे प्रेमी के लिए है तो पूरे रास्ते मैं इतना उखड़ी हुई नहीं रहती। इन अंगूरों को धूप से बचाकर लाती। अपनी शिकायतों में मैंने पर्वतों की उस सुंदरता को भी नहीं देखा, जिस पर मैं चढ़े जा रही थी।"

Tuesday, January 3, 2017

शिकायत

एक महिला अपने छोटे से बच्चे के साथ समुद्र के पास
खेलने गई । समुद्र की लहरें तेजी से आ-जा रही थीं। उसने अपने बेटे की बाजू पूरी मजबूती से पकड़ी हुईं थीं। दोनों पानी के साथ खेल रहे थे। अचानक पानी की एक विशाल लहर उनके सामने प्रकट हुई। ज्वार की यह लहर उनके ठीक सामने ही ऊपर और ऊपर उठती चली गयी और उनके ऊपर छा गयी । जब पानी वापस लौटा, तो छोटा बच्चा कहीं दिखाई नहीं दिया । शोकाकुल माँ ने अपने बच्चे को खूब आवाज लगायी और खोजा । वह चिल्लाती जा रही थी और पानी में हर तरफ खोज रहीं थीं। धीरे-धीरे यह तो स्पष्ट हो गया की उसे सागर बहा ले गया है। पुत्र के वियोग मे व्याकुल माँ ने प्रार्थना की 'हे देव, मुझ पर कृपा करो , मुझ पर रहम करो मेरे पुत्र को वापस कर दो । मैं हमेशा आपकी आभारी रहूंगी । मैं और मेरे पति कभी कोई गलत काम नहीं
करेंगे। बड़ों का हमेशा सम्मान करेंगे। बस मेरे पुत्र को वापस दे दिजिए । बस, तभी एक पानी का दिवाकर प्रकट हुआ और उसके सिर पर गिर गया। जब पानी वापस लौटा तो उसके पास खड़ा बच्चा पाया। बच्चे को गले से लगायी और ऊपर देख कर बोला बच्चा तो लौट आया पर उसने महंगी टोपी पहन रखी थी। बच्चा की कीमती टोपी खो गयी। अब वह इसलिए प्रसन्न नहीं हो पा रही थी कि बच्चे की टोपी खो गयी।
"जीवन में हमने क्या पाया, ईश्वर को इसकी धन्यवाद देने के वजाए। क्या खोया इसकी शिकायत करते रहते हैं।"

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